ताड़पत्रों में सुरक्षित है हमारी विरासत : रायगढ़ के सकरबोगा गांव में 250 वर्ष पुरानी दुर्लभ पांडुलिपियों का संरक्षण, ज्ञान भारतम पोर्टल पर की गई ऑनलाइन प्रविष्टि

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राष्ट्रीय पांडुलिपि संरक्षण अभियान से जुड़कर ग्रामीण क्षेत्र में सहेजी जा रही सांस्कृतिक धरोहर
रामायण, भागवत गीता सहित धार्मिक ग्रंथों से जुड़ी ओड़िया भाषा की पांडुलिपियों के संरक्षण को लेकर बढ़ी जागरूकता

रायपुर : भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने की दिशा में केंद्र और  राज्य शासन द्वारा चलाए जा रहे विशेष अभियानों का सकारात्मक प्रभाव अब ग्रामीण अंचलों में भी दिखाई देने लगा है। छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले के धरमजयगढ़ क्षेत्र अंतर्गत ग्राम सकरबोगा में  दुर्लभ ताड़पत्र पांडुलिपियों का संरक्षण कर उन्हें डिजिटल माध्यम से सुरक्षित करने की महत्वपूर्ण पहल की गई है। यह पहल न केवल हमारी ऐतिहासिक धरोहर को बचाने का प्रयास है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भारतीय ज्ञान परंपरा से जोड़ने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

राष्ट्रीय सेवा योजना (रासेयो) कार्यक्रम अधिकारी डॉ. के.के. गुप्ता द्वारा पांडुलिपि संरक्षण अभियान के अंतर्गत ग्राम सकरबोगा, पोस्ट बनोरा में सर्वे और अध्ययन के दौरान कई प्राचीन ताड़पत्र पांडुलिपियां चिन्हित की गईं। इनमें ग्रामीण प्रमोद सा के पास 20 ताड़पत्र, बैरागी गुप्ता के पास 1 ताड़पत्र तथा ठाकुरदत्त गुप्ता के पास 1 ताड़पत्र संरक्षित पाए गए। ये सभी पांडुलिपियां ओड़िया भाषा में लिखी गई हैं और इनमें रामायण, श्रीमद्भागवत गीता तथा अन्य धार्मिक एवं आध्यात्मिक ग्रंथों से संबंधित महत्वपूर्ण सामग्री सुरक्षित है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार ग्रामीण प्रमोद सा ने बताया कि उनके पास सुरक्षित पांडुलिपियां लगभग 200 से 250 वर्ष पुरानी हैं। पीढ़ी दर पीढ़ी इन दुर्लभ ताड़पत्रों को परिवार द्वारा संभालकर रखा गया है। ग्रामीण परिवेश में वर्षों से सुरक्षित ये पांडुलिपियां आज भी भारतीय संस्कृति, अध्यात्म और पारंपरिक ज्ञान की जीवंत मिसाल बनी हुई हैं।

डॉ. के.के. गुप्ता ने उच्च अधिकारियों के मार्गदर्शन में इन पांडुलिपियों की जानकारी भारत सरकार के “ज्ञान भारतम पोर्टल” पर ऑनलाइन दर्ज की है। यह पोर्टल देशभर में उपलब्ध प्राचीन पांडुलिपियों के डिजिटलीकरण, संरक्षण और दस्तावेजीकरण के लिए महत्वपूर्ण माध्यम बनकर उभरा है। इसके जरिए दुर्लभ पांडुलिपियों का डिजिटल रिकॉर्ड तैयार किया जा रहा है, ताकि भविष्य में शोध, अध्ययन और संरक्षण कार्यों में इसका उपयोग किया जा सके।

पांडुलिपियों के जियोटैगिंग कार्य के दौरान फोटो एवं वीडियो भी तैयार किए गए, जिन्हें सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर साझा किया गया। इसका उद्देश्य आम लोगों विशेषकर युवाओं को अपनी सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के प्रति जागरूक करना है। सोशल मीडिया के माध्यम से यह संदेश दिया जा रहा है कि गांवों और घरों में वर्षों से सुरक्षित पुरानी पांडुलिपियां केवल धार्मिक सामग्री नहीं, बल्कि देश की ऐतिहासिक और बौद्धिक धरोहर हैं।

उल्लेखनीय है कि भारत सरकार संस्कृति मंत्रालय एवं राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन के माध्यम से देशभर में पांडुलिपियों के संरक्षण, डिजिटलीकरण और सूचीकरण का विशेष अभियान चला रही है। इस अभियान का उद्देश्य भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा, साहित्य, दर्शन, विज्ञान, आयुर्वेद, ज्योतिष, धर्म और संस्कृति से संबंधित दुर्लभ दस्तावेजों को संरक्षित करना है। छत्तीसगढ़ सहित विभिन्न राज्यों में भी इस दिशा में जागरूकता कार्यक्रम, सर्वेक्षण और डिजिटलीकरण कार्य लगातार किए जा रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी हजारों दुर्लभ पांडुलिपियां निजी संरक्षण में सुरक्षित हैं, जिनकी पहचान और दस्तावेजीकरण अत्यंत आवश्यक है। सकरबोगा गांव में मिली पांडुलिपियां इस बात का प्रमाण हैं कि भारत की सांस्कृतिक जड़ें आज भी गांवों में जीवित हैं और यदि समय रहते इन्हें संरक्षित किया जाए तो आने वाली पीढ़ियां अपनी गौरवशाली विरासत को और बेहतर ढंग से समझ सकेंगी।

डॉ. के.के. गुप्ता ने बताया कि पांडुलिपि संरक्षण अभियान का उद्देश्य केवल दस्तावेजों को सुरक्षित करना नहीं, बल्कि लोगों में अपनी सांस्कृतिक धरोहर के प्रति सम्मान और जिम्मेदारी की भावना विकसित करना भी है। उन्होंने कहा कि यदि समाज और प्रशासन मिलकर इस दिशा में कार्य करें तो देश की अमूल्य ज्ञान संपदा को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है।

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